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संध्या वंदना

संस्कार एवं श्राद्ध-विधि

अन्य नाम: संध्या वंदना, संध्यावंदन, संध्योपासन, त्रिकाल संध्या

नित्यकर्मगायत्री मंत्रउपनयनगृह्यसूत्र

संध्या वंदना दिन और रात के संधिकाल में की जाने वाली नित्य उपासना है। इसे संध्योपासन भी कहते हैं।

यह दिन में तीन बार — प्रातः, मध्याह्न और सायं — की जाती है। विधि में आचमन, मार्जन, प्राणायाम, सूर्य को अर्घ्य, गायत्री मंत्र का जप और उपस्थान आदि अंग होते हैं; प्रातः पूर्व, मध्याह्न उत्तर और सायं पश्चिम दिशा की ओर मुख किया जाता है।

इसका आधार गृह्यसूत्र, मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति हैं। यह उपनयन के बाद द्विज का नित्य कर्तव्य है और इसका महत्व आत्म-शुद्धि तथा मोक्ष-प्राप्ति में माना जाता है।

प्रसिद्ध कथन

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ (गायत्री मंत्र, ऋग्वेद 3.62.10)

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स्रोत: गृह्यसूत्र