उपचरी
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: उपरिचर वसु, उपचरि, वसु उपरिचर
वसु नाम के राजा नारायण के परम भक्त थे। उन्होंने शस्त्र त्यागकर घोर तपस्या आरंभ की, जिससे भयभीत इंद्र ने उन्हें तप से निवृत्त कर स्फटिक का विमान, वैजयंती माला तथा त्रिलोकदर्शी होने का वरदान दिया। उस विमान में आकाश में विचरने के कारण वे 'उपरिचर' कहलाए। कोलाहल पर्वत ने शुक्तिमती नदी को रोका, तब उन्होंने पैर के प्रहार से पर्वत को दो टुकड़े कर दिया; पर्वत के संयोग से उत्पन्न पुत्र-पुत्री उन्हें समर्पित हुए, और गिरिका नामक कन्या से उनका विवाह हुआ।
यह कथा महाभारत के आदि पर्व तथा शान्ति पर्व में वर्णित है और भागवत पुराण में भी इसका संकेत मिलता है।
मुख्य पात्र उपरिचर वसु, उनकी पत्नी गिरिका, मत्स्य तथा सत्यवती हैं। शिकार के समय उनका वीर्य यमुना में गिरा, जिसे मत्स्यरूपा अप्सरा अद्रिका ने ग्रहण किया; उससे मत्स्यराज और मत्स्यगंधा (सत्यवती) का जन्म हुआ। सत्यवती आगे वेदव्यास की माता बनीं। बाद में 'अज' शब्द के अर्थ पर ऋषियों-देवताओं के विवाद में उपरिचर ने देवताओं का पक्ष लिया, जिससे क्रुद्ध ऋषियों ने उन्हें पाताल में गिरने का शाप दिया। इस कथा का महत्व यह है कि यह सत्यवती और व्यास के जन्म की पृष्ठभूमि तथा न्याय में पक्षपात के दुष्परिणाम को दर्शाती है।
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स्रोत: महाभारत – आदि पर्व; शान्ति पर्व