कृत्तिवासा
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: कृत्तिवासा शिव, गजासुर वध, कृत्तिवासेश्वर
महिषासुर के पुत्र गजासुर ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए घोर तप किया और ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया कि काम-वश हुए किसी भी प्राणी से उसकी मृत्यु न होगी। वर पाकर वह अत्यंत अहंकारी हो गया और देवताओं तथा तीनों लोकों को आतंकित करने लगा। तब शिव ने त्रिशूल से उसका वध किया।
यह कथा शिव पुराण की रुद्र संहिता (पंचम युद्ध खण्ड) में विस्तार से वर्णित है और स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में भी इसका उल्लेख मिलता है।
मुख्य पात्र गजासुर, महिषासुर और शिव हैं। मरते समय गजासुर ने प्रार्थना की कि शिव उसका चर्म धारण करें; तब शिव ने उसका चर्म ओढ़ लिया और इसी कारण 'कृत्तिवासा' नाम से विख्यात हुए, तथा काशी में कृत्तिवासेश्वर लिंग की स्थापना की। इस कथा का महत्व यह है कि अहंकार का अंत अवश्य होता है और भगवान दुष्टों का संहार कर भक्तों की रक्षा करते हैं।
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स्रोत: शिव पुराण – रुद्र संहिता (युद्ध खण्ड)