शबरी
रामायण एवं रामचरितमानस
अन्य नाम: श्रमणा, भीलनी शबरी
शबरी एक भील (श्रमणा) स्त्री थीं, जिन्होंने बाल्यावस्था में विवाह का प्रस्ताव अस्वीकार करके वानप्रस्थ जीवन चुना और मतंग ऋषि की शिष्या बनीं।
गुरु के निधन के बाद वे उनकी आज्ञा से राम-आगमन की प्रतीक्षा करती रहीं और प्रतिदिन पथ साफ करतीं, ताकि प्रभु पधारें।
जब राम पंपा-सरोवर के मार्ग में उनके आश्रम आए, तो उन्होंने अपने हाथों से चुने और चखे हुए (जूठे) बेर प्रेमपूर्वक प्रभु को अर्पित किए; राम ने वे बेर खाकर उनकी भक्ति स्वीकार की और उन्हें मोक्ष दिया। यह प्रसंग सगुण-भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।
नाते-रिश्ते
- गुरु: मतंग ऋषि
- भक्त: श्रीराम
प्रसिद्ध कथन
राम से: "हे प्रभु, ये बेर मैंने स्वयं चखकर मीठे चुने हैं; कृपा कर स्वीकार करें।" (भावानुवाद)
राम का आश्वासन: "हे भामिनि, तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ; तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा।" (भावानुवाद)
संबंधित
स्रोत: वाल्मीकि रामायण – अरण्यकाण्ड; रामचरितमानस – अरण्यकाण्ड