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दुर्वासा

वेद एवं पुराण

अन्य नाम: दुर्वासा मुनि, क्रोधी मुनि, अत्रि-पुत्र, शिव-अंश

ऋषितपस्वीश्रापशिव

दुर्वासा अत्रि ऋषि के पुत्र और परंपरा में शिव के अंशावतार माने जाते हैं। अपने तीव्र क्रोध और श्राप देने के लिए वे कथा-साहित्य में प्रसिद्ध हैं — पर उनके श्राप प्रायः देव-इच्छा या किसी बड़े प्रसंग की भूमिका बनते हैं। उनकी उपासना में अतिथि-सत्कार और दान-धर्म का महत्व विशेष रूप से प्रतिपादित हुआ है।

उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रसंग समुद्र-मंथन का कारण बनना है — जब देवराज इंद्र ने अपनी सभा में दुर्वासा द्वारा भेजी दिव्य माला को अवहेलना से हाथी के मस्तक पर डलवा दिया, तब क्रुद्ध दुर्वासा ने इंद्र को श्राप दिया कि उनका ऐश्वर्य (लक्ष्मी) नष्ट हो जाएगा। इसी श्राप के कारण देवताओं का बल क्षीण हुआ और देव-दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया।

अन्य प्रसंगों में — शकुंतला को दुष्यंत के विषय में श्राप, अंबरीष राजा की परीक्षा (जहाँ विष्णु-चक्र से दुर्वासा की रक्षा हुई), तथा सूर्यवंश के राजाओं से जुड़ी अनेक कथाएँ प्रमुख हैं। कहीं-कहीं उन्हें ऋषि दुर्वासा द्वारा पांडवों की पत्नी द्रौपदी को भी श्राप देने का उल्लेख मिलता है।

दुर्वासा की कथाएँ श्रीमद्भागवत पुराण तथा महाभारत में विस्तृत हैं।

नाते-रिश्ते

  • पिता: अत्रि
  • माता: अनसूया
  • अंश: शिव

प्रसिद्ध कथन

दुर्वासा ने इंद्र को श्राप दिया — तुम्हारा ऐश्वर्य, लक्ष्मी और श्री नष्ट हो जाएँ। (भावानुवाद) — इसी से समुद्र-मंथन का मार्ग खुला।
परंपरा में दुर्वासा को शिव का अंश कहा गया, जो भक्तों की अतिथि-सेवा व दान की परीक्षा लेते हैं। (भावानुवाद)
मंत्र — "ॐ दुर्वाससे नमः।"

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण; महाभारत