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केन उपनिषद

ग्रंथ

अन्य नाम: केनोपनिषद्, केन

रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय

उपनिषदवेदांतब्रह्मसामवेद

केन उपनिषद सामवेद की तलवकार शाखा से संबंधित है। इसका नाम 'केन' शब्द से पड़ा है, जो इसके प्रारंभिक प्रश्न 'केन इषितं...' का हिस्सा है।

इसमें चार खंड हैं। यह प्रश्न करता है कि मन, वाणी और इंद्रियाँ किसकी शक्ति से कार्य करती हैं, और उत्तर देता है कि वह ब्रह्म ही सबका प्रेरक है।

इसके उत्तरार्ध में देवताओं और ब्रह्म के प्रतीकात्मक आख्यान हैं, जिनमें इन्द्र को उमा हेमवती से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है।

यह श्रुति का भाग होने से अपौरुषेय है। यह उपनिषद अद्वैत ब्रह्म और उसकी अवर्णनीयता पर बल देता है — ब्रह्म को वाणी और मन से नहीं पाया जा सकता।

प्रसिद्ध कथन

यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते (केन उपनिषद 1.4) — भाव: 'जो वाणी से नहीं कहा जाता, जिससे वाणी कही जाती है, वही ब्रह्म है।'

संबंधित

सामवेदउपनिषदब्रह्मइंद्रआत्मा

स्रोत: केन उपनिषद (सामवेद, तलवकार शाखा)