ऋषभदेव का त्याग
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: ऋषभदेव, ऋषभनाथ, भगवान ऋषभ, जड़भरत के पिता
राजा नाभि और रानी मेरुदेवी के पुत्र ऋषभदेव भगवान विष्णु के अंशावतार थे। उन्होंने धर्मपूर्वक राज्य किया, प्रजा को ज्ञान दिया और जीवन के अंतिम आश्रम की ओर बढ़े। राज्य अपने पुत्र भरत को सौंपकर उन्होंने सांसारिक मोह का त्याग किया और अवधूत रूप में वन में विचरते हुए परमात्म-चिंतन में लीन हो गए।
यह प्रसंग श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध में विस्तार से वर्णित है, जहाँ उनका उपदेश जड़भरत के रूप में आगे चलता है। जैन परंपरा में वे प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के रूप में पूज्य हैं।
मुख्य पात्र ऋषभदेव, उनके सौ पुत्र (जिनमें भरत प्रमुख), और भरत के पुत्र जड़भरत हैं। त्याग के बाद ऋषभदेव ने अपने शरीर तक की उपेक्षा करते हुए ज्ञान-ध्यान से मोक्ष प्राप्त किया। इस कथा का महत्व यह है कि राजसुख भोगते हुए भी वैराग्य संभव है और सच्चा त्याग ही मुक्ति का मार्ग है।
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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – पंचम स्कन्ध