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पुरंजन

कथाएँ एवं घटनाएँ

नारद ने राजा प्राचीनबर्हि को पुरंजनोपाख्यान सुनाया—एक राजा पुरंजन का अविज्ञात नामक मित्र था, और वह भोगों के लिए अनुकूल नगर खोजता रहा। एक दिन उसने हिमालय के दक्षिण में नौ द्वारों वाला सुंदर नगर देखा।

यह प्रतीकात्मक कथा श्रीमद्भागवत पुराण के चतुर्थ स्कन्ध में वर्णित है। पुरंजन उस नगरी में पुरंजनी नामक स्त्री से विवाह करके उसके मोह में बँध गया और भोगों में लिप्त होकर अपने मित्र को भूल गया।

मुख्य पात्र पुरंजन, पुरंजनी और अविज्ञात (परमात्मा) हैं। नारद ने बताया कि पुरंजन जीव है, नौ द्वारों वाली नगरी यह देह है, पुरंजनी बुद्धि है और अविज्ञात मित्र परमात्मा है; देह त्यागने पर जीव अपने कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म लेता है। कथा का महत्व यह है कि जीव अपने सच्चे मित्र परमात्मा को भूलकर मोह में बँधा रहता है; उनका स्मरण ही मुक्ति का मार्ग है।

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – चतुर्थ स्कन्ध