वरुणदेव का वरदान
कथाएँ एवं घटनाएँ
त्रिलोकनाथ माता-पिता के देहांत के बाद अनाथ हो गया; उसका सौतेला बड़ा भाई आलोक और उसकी पत्नी उससे द्वेष रखते थे। वह दिन-भर घर और खेत का काम करता, फिर भी भर पेट भोजन न पाता, और किसी से शिकायत नहीं करता।
यह कथा परंपरा-प्रसिद्ध है। कुछ समय बाद आलोक ने उसका विवाह कराकर संपत्ति बाँटकर उसे अलग कर दिया। एक दिन खेत से लौटते समय त्रिलोकनाथ एक तालाब के पास रुका और वहाँ स्नान करने लगा।
मुख्य पात्र त्रिलोकनाथ, आलोक और वरुणदेव हैं। जल के देवता वरुण ने उसके संतोष, परिश्रम और भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया, जिससे उसका दुःख दूर हुआ और वह सुखी हुआ। कथा का महत्व यह है कि संतोष और सच्ची श्रद्धा से देवता प्रसन्न होते हैं; दूसरों की निंदा और द्वेष व्यर्थ है।
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स्रोत: परंपरा-प्रसिद्ध