न्याय सूत्र
ग्रंथ
अन्य नाम: न्याय दर्शन, न्यायसूत्र, न्यायसूत्रम्
रचयिता / कर्ता: गौतम
न्याय सूत्र न्याय दर्शन — छह वैदिक दर्शनों में से एक — का मूल ग्रंथ है, जिसके रचयिता गौतम (गौतम अक्षपाद) माने जाते हैं। ग्रंथ पाँच अध्यायों में विभाजित है।
मुख्य विषय ज्ञान और तर्क की मीमांसा है। इसमें सोलह पदार्थों — प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान — का वर्णन है।
दर्शन के चार प्रमाण — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द — का प्रतिपादन इसी में हुआ। इसका लक्ष्य तत्त्वज्ञान द्वारा निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति बताया गया है।
महात्मा: भारतीय तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा का यह मूल आधार है; भारतीय न्याय-पद्धति तथा अनेक दर्शनों पर इसका प्रभाव है।
प्रसिद्ध कथन
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः॥ (१.१.१)
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स्रोत: न्याय सूत्र