नामकरण संस्कार
संस्कार एवं श्राद्ध-विधि
अन्य नाम: नामकरण, नामकरणम्
नामकरण संस्कार में नवजात शिशु को शुभ और अर्थपूर्ण नाम दिया जाता है। यह शिशु के जन्म के बाद का प्रमुख संस्कार है।
यह प्रायः जन्म के दसवें या बारहवें दिन किया जाता है, कहीं-कहीं सौवें दिन या एक वर्ष बाद भी। विधि में हवन, मधु-प्राशन और पिता द्वारा शिशु के दाहिने कान में नाम का उच्चारण होता है; नाम नक्षत्र और वर्ण के अनुसार रखा जाता है।
इसकी विधि गोभिल, आश्वलायन और शांखायन आदि गृह्यसूत्रों तथा मनुस्मृति में मिलती है। इसका महत्व शिशु को व्यक्तिगत पहचान, शुभ संस्कार और कुल-परंपरा से जोड़ने में है।
प्रसिद्ध कथन
ॐ कोऽसि कतमोऽसि कस्यासि को नामासि। ये देवा नामधेयास्तेषां त्वा नाम्ना नामयामि॥
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स्रोत: गृह्यसूत्र