जातकर्म संस्कार
संस्कार एवं श्राद्ध-विधि
अन्य नाम: जातकर्म, जातकर्मम्
जातकर्म जन्म के तुरंत बाद किया जाने वाला संस्कार है। इसका उद्देश्य नवजात शिशु को शुद्ध करना तथा उसके दीर्घायु और मेधा की प्रार्थना करना है।
यह गर्भ-नाल काटने से पहले किया जाता है। पिता स्वर्ण की शलाका या अंगूठे से शिशु की जिह्वा पर मधु और घृत रखते हुए मंत्र बोलता है, उसके कान में गुप्त नाम का उच्चारण करता है और आशीर्वाद देता है।
इसका आधार गृह्यसूत्र और मनुस्मृति हैं। इसका महत्व शिशु की आयु, बल और बुद्धि की वृद्धि तथा उसके जीवन को संस्कारों से जोड़ने में है।
प्रसिद्ध कथन
मेधां ते देवः सविता मेधां देवी सरस्वती। मेधां ते अश्विनौ देवावादधतां पुष्करस्रजौ॥
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स्रोत: गृह्यसूत्र