मुण्डक उपनिषद
ग्रंथ
अन्य नाम: मुण्डकोपनिषद्, मुण्डक
रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय
मुण्डक उपनिषद अथर्ववेद से संबंधित है। इसका नाम 'मुण्ड' (सिर मुंडित) से जुड़ा माना जाता है, जो सन्यास और वैराग्य का प्रतीक है।
इसमें तीन मुण्डक (खंड) हैं। यह विद्या को दो भागों में बाँटता है — अपरा विद्या (लौकिक ज्ञान) और परा विद्या (आत्मज्ञान), और परा विद्या को श्रेष्ठ बताता है।
इसमें ब्रह्म को अविनाशी, अदृश्य और सर्वव्यापी कहा गया है, तथा 'दो पक्षी' का प्रसिद्ध रूपक भी मिलता है। इसी उपनिषद से 'सत्यमेव जयते' का वाक्य लिया गया है।
यह श्रुति का भाग होने से अपौरुषेय है। यह ग्रंथ ज्ञान की श्रेष्ठता और ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग दर्शाता है।
प्रसिद्ध कथन
सत्यमेव जयते नानृतं (मुण्डक उपनिषद 3.1.6) — भाव: 'सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं।'
संबंधित
स्रोत: मुण्डक उपनिषद (अथर्ववेद)