लक्ष्मी की महिमा
कथाएँ एवं घटनाएँ
दुर्वासा के शाप से इंद्र का ऐश्वर्य नष्ट हो गया और लक्ष्मी सागर में लीन हो गई। तब देवताओं ने विष्णु के परामर्श से समुद्र-मंथन किया।
यह कथा विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है। मंथन से क्रमशः कामधेनु, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, कौस्तुभ, पारिजात, वारुणी आदि रत्न निकले; इनके बाद कमल पर विराजमान लक्ष्मी स्वयं प्रकट हुईं।
मुख्य पात्र लक्ष्मी, विष्णु और देवता हैं। लक्ष्मी ने सबके समक्ष विष्णु को वरमाला पहनाई और देवताओं को अभय किया कि वे अब श्री से वंचित नहीं रहेंगे; अंत में मंथन से धन्वंतरि हाथ में अमृत-कलश लिए प्रकट हुए। लक्ष्मी धन, समृद्धि, सौभाग्य और गृहस्थ-सुख की अधिष्ठात्री हैं, और दीपावली तथा शुक्रवार को उनकी पूजा होती है। कथा का महत्व यह है कि श्री भगवान के चरणों की आश्रित रहती है और भक्ति से ही स्थायी समृद्धि मिलती है।
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स्रोत: विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण – समुद्र-मंथन प्रसंग