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रैक्व की कथा

कथाएँ एवं घटनाएँ

महाराज जानश्रुति अत्यंत दानशील और कीर्तिमान थे, किंतु उन्हें ब्रह्म-ज्ञान का अभाव खलता था। एक सायंकाल जब वे अपने महल की अटारी पर थे, कुछ हंस पक्षियों की बातचीत उन्होंने सुनी, जिसमें रैक्व नामक तत्वज्ञानी की प्रशंसा थी।

यह कथा छांदोग्य उपनिषद के चतुर्थ अध्याय में वर्णित है। पक्षियों ने बताया कि जानश्रुति का दान-पुण्य भी रैक्व के ब्रह्म-ज्ञान के सामने तुच्छ है, क्योंकि ज्ञान रथ और पद का विषय नहीं।

मुख्य पात्र राजा जानश्रुति और रैक्व हैं। जानश्रुति ने छह सौ गायें, स्वर्ण-हार और मूल्यवान रथ लेकर रैक्व के पास जाकर उन्हें शिष्यत्व दिया; रैक्व ने पहले तो प्रस्ताव ठुकराया, पर अंत में उनसे ब्रह्मविद्या स्वीकार की। रैक्व ने जानश्रुति को 'सम्वर्ग विद्या' का उपदेश दिया। कथा का महत्व यह है कि आत्म-ज्ञान धन या पद से नहीं, गुरु की कृपा और श्रद्धा से मिलता है।

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स्रोत: छांदोग्य उपनिषद – चतुर्थ अध्याय