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कुंती का त्याग

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: कुंती वनगमन, कुंती का वन-प्रवेश

महाभारतआश्रमवासिक पर्वकुंतीवैराग्य

कुरुक्षेत्र युद्ध की समाप्ति के बाद कुंती ने युधिष्ठिर को कर्ण के जन्म का सत्य बताया और उस महान योद्धा के खो जाने का शोक सहा। अब उनका मन संसार से विरक्त हो चुका था। धृतराष्ट्र, गांधारी और विदुर के साथ उन्होंने युधिष्ठिर से आज्ञा लेकर राजमहल छोड़ दिया और वन में तपस्या के लिए प्रस्थान किया।

यह प्रसंग महाभारत के आश्रमवासिक पर्व में वर्णित है, जहाँ वृद्धजनों के वनगमन का मार्मिक वर्णन मिलता है। वन में महर्षि व्यास तथा संजय ने उन्हें दर्शन दिया।

मुख्य पात्र कुंती, युधिष्ठिर, धृतराष्ट्र, गांधारी और विदुर हैं। वन में कुछ समय तप करने के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी तथा कुंती दावानल में प्राण त्याग कर परलोक गए। इस कथा का महत्व यह है कि राजमाता होते हुए भी कुंती ने वैराग्य और वानप्रस्थ धर्म का उत्तम आदर्श प्रस्तुत किया; सांसारिक सुखों का त्याग ही परम शांति का मार्ग है।

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स्रोत: महाभारत – आश्रमवासिक पर्व