दान की महिमा
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: दान महिमा, दान का महत्व, दान-धर्म
दान का अर्थ है अपनी शक्ति के अनुसार पात्र को श्रद्धा और निष्काम भाव से वस्तु अर्पित करना। शास्त्रों में दान को सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है; यह पाप नष्ट करता है, यममार्ग पर सहायक होता है और स्वर्ग तथा मोक्ष का मार्ग खोलता है। गो-दान, भूमि-दान, अन्न-दान और विद्या-दान को विशेष महत्व दिया गया है।
यह विषय गरुड़ पुराण में विस्तार से वर्णित है और महाभारत के अनुशासन पर्व तथा शान्ति पर्व में भी दान-धर्म का महत्व बताया गया है। इसके अतिरिक्त शिबि, बलि, कर्ण तथा राजा गय की दान-कथाएँ परंपरा में प्रसिद्ध हैं।
मुख्य पात्रों में राजा शिबि, बलि, कर्ण और दानी राजा गिनाए जाते हैं। गुजरात की राजमाता मीणल देवी की प्रसिद्ध कथा भी इसी से जुड़ी है, जिसमें अहंकारयुक्त विशाल दान की तुलना में एक निर्धन ब्राह्मणी के भावपूर्ण अल्प दान को श्रेष्ठ बताया गया। इस कथा का महत्व यह है कि दान में वस्तु से अधिक भावना और पात्रता का मूल्य होता है; जो दान देकर अहंकार करता है, उसका पुण्य नष्ट हो जाता है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: गरुड़ पुराण – दान-महिमा; महाभारत – अनुशासन पर्व