अंगुलिमाल
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: अंगुलिमाल, अहिंसक, डाकू अंगुलिमाल
कोसल राज्य में अंगुलिमाल नाम का डाकू रहता था, जो यात्रियों को लूटकर उनकी एक-एक अंगुली काटकर माला बनाकर पहनता था। वह हिंसा और वध में निर्दय था और गाँव-नगर उजाड़ देता था। एक दिन भगवान बुद्ध उसी मार्ग पर अकेले चल पड़े; अंगुलिमाल उनके पीछे दौड़ा पर उन्हें पकड़ न सका।
यह कथा बौद्ध परंपरा के अंगुलिमाल सुत्त (मज्झिम निकाय) में वर्णित है और परंपरा-प्रसिद्ध भी है। बुद्ध की करुणा और शांति ने हिंसक डाकू का हृदय ही बदल दिया।
मुख्य पात्र अंगुलिमाल, भगवान बुद्ध और राजा प्रसेनजित हैं। बुद्ध ने उससे कहा कि वे तो रुक चुके हैं, पर अंगुलिमाल अभी नहीं रुका; यह सुनकर उसने अस्त्र त्याग दिए, भिक्षु बना और अर्हत् पद प्राप्त किया। इस कथा का महत्व यह है कि सच्चा परिवर्तन करुणा और अहिंसा से ही संभव है; कोई भी पतित होकर भी सुधर सकता है।
प्रसिद्ध कथन
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स्रोत: अंगुलिमाल सुत्त (मज्झिम निकाय) – परंपरा-प्रसिद्ध