कैवल्य उपनिषद
ग्रंथ
अन्य नाम: कैवल्योपनिषत्
रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय / परंपरा-प्रसिद्ध
कैवल्य उपनिषद एक लघु और सुबोध उपनिषद है। इसमें आश्वलायन ऋषि ब्रह्मा से ब्रह्मविद्या पूछते हैं और ब्रह्मा उत्तर देते हैं। कैवल्य का अर्थ है — आत्मा का अकेलापन, अर्थात् पूर्ण स्वतंत्रता।
इसका संबंध कृष्ण यजुर्वेद से बताया जाता है, जबकि कुछ पांडुलिपियाँ इसे अथर्ववेद से जोड़ती हैं। इसमें शिव-ध्यान तथा हृदय-कमल में ब्रह्म के ध्यान का वर्णन है।
इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि कर्म, संतान या धन से नहीं, केवल त्याग और ज्ञान से अमरत्व मिलता है। प्रसिद्ध वाक्य है — न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः, अर्थात् कर्म, संतान और धन से नहीं, त्याग से ही कुछ लोगों ने अमरत्व पाया।
प्रसिद्ध कथन
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ।
स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
संबंधित
स्रोत: कृष्ण यजुर्वेद / अथर्ववेद