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जाबाल उपनिषद

ग्रंथ

अन्य नाम: जाबालोपनिषद्, जबाल उपनिषद

रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय / परंपरा-प्रसिद्ध

उपनिषदसंन्यासवेदांत

जाबाल उपनिषद संन्यास और त्याग का प्रमुख उपनिषद है। इसमें बताया गया है कि मनुष्य किसी भी आश्रम में रहते हुए त्याग कर सकता है और सच्चा संन्यासी आत्मा-ब्रह्म की एकता में लीन रहता है।

यह उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से जुड़ा है और इसे बीस संन्यास उपनिषदों में गिना जाता है। यह प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है।

इसका मुख्य सिद्धांत है कि वास्तविक तीर्थ काशी नहीं, बल्कि भीतर स्थित आत्मा है। प्रसिद्ध वाक्य है — अविमुक्तं वै क्षेत्रम्, अर्थात् यही अविमुक्त क्षेत्र है, और सबसे पवित्र स्थान भीतर का आत्मा है।

प्रसिद्ध कथन

अविमुक्तं वै क्षेत्रम्।

संबंधित

काशीआत्माउपनिषदवेदांत

स्रोत: शुक्ल यजुर्वेद