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आरुणि-उद्दालक कथा

कथाएँ एवं घटनाएँ

उद्दालक आरुणि गौतम गोत्र के प्रसिद्ध तत्त्वज्ञानी थे। उनके पुत्र श्वेतकेतु ने बारह वर्ष गुरुकुल में रहकर वेदों का अध्ययन किया और लौटने पर उसे अपने ज्ञान का अभिमान हो गया। पिता ने उससे एक ऐसा प्रश्न पूछा जिसका उत्तर बारह वर्ष की पढ़ाई में नहीं मिला था।

यह कथा छांदोग्य उपनिषद के छठे अध्याय में वर्णित है। उद्दालक ने पुत्र को मिट्टी, सोने, वट-बीज, नदियों और जल में घुले नमक के दृष्टांतों से समझाया कि जिस एक सत् को जान लेने पर सब जाना जाता है, वही सबका मूल कारण है।

मुख्य पात्र उद्दालक आरुणि और उनका पुत्र श्वेतकेतु हैं। उद्दालक ने नौ बार वही महावाक्य दोहराया—'तत् त्वम् असि', अर्थात् वह सत्य तुम ही हो। इससे श्वेतकेतु का अभिमान मिटा और उसे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। कथा का महत्व यह है कि केवल पुस्तक-ज्ञान ही पर्याप्त नहीं; आत्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव ही सच्ची विद्या है।

प्रसिद्ध कथन

सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्॥ (भावानुवाद) हे सौम्य! आरम्भ में यह सब केवल सत् था, एक ही, दूसरा कुछ नहीं।
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो॥ (भावानुवाद) जो यह सूक्ष्म सार है, यह सब वही है; वह सत्य है, वह आत्मा है—हे श्वेतकेतु! वह तुम ही हो।

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स्रोत: छांदोग्य उपनिषद – छठा अध्याय