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ऐतरेय की कथा

कथाएँ एवं घटनाएँ

हारीत वंश के माण्डूकि ऋषि की पत्नी इतरा से महिदास का जन्म हुआ। बालक बचपन से ही मौन रहकर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करता था, इसलिए पिता उसे मूर्ख मानकर उपेक्षा करने लगे और उन्होंने पिंगा नाम की दूसरी स्त्री से विवाह कर लिया।

यह कथा स्कन्द पुराण में वर्णित है, तथा ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय आरण्यक (ऋग्वेद) में महिदास ऐतरेय का स्मरण मिलता है। जब माता इतरा ने अपमान से दुखी होकर देह-त्याग का विचार किया, तब महिदास ने उसे धर्मोपदेश देकर रोका और स्वयं भगवान वासुदेव की उपासना में लग गया।

भगवान विष्णु की कृपा से महिदास को वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ, और कोटितीर्थ में राजा हरिमेध के यज्ञ में उनके प्रभावशाली प्रवचन से सब चकित हो गए; राजा ने अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया। अपनी माता इतरा के नाम पर वे 'ऐतरेय' कहलाए। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार वे एक सौ सोलह वर्ष तक जीवित रहे। कथा का महत्व यह है कि सच्ची विद्या और भक्ति जन्म या सामाजिक स्थान पर नहीं, तप और गुण पर निर्भर है।

प्रसिद्ध कथन

(भावानुवाद) हे रोग! तू मुझे क्यों सताता है? मैं तुझसे मरने वाला नहीं हूँ।

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स्रोत: स्कन्द पुराण – ऐतरेय-माहात्म्य