हंस उपनिषद
ग्रंथ
अन्य नाम: हंसोपनिषद्, हंस नाद उपनिषद
रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय / परंपरा-प्रसिद्ध
हंस उपनिषद हंस-विद्या का प्रतिपादन करने वाला उपनिषद है। इसमें गौतम ऋषि और सनत्कुमार के बीच संवाद है, जो हंस-विद्या को ब्रह्मविद्या का द्वार बताते हैं।
यह उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से जुड़ा है और इसे योग उपनिषदों में गिना जाता है। यह अपेक्षाकृत नए काल का ग्रंथ माना जाता है।
इसका मुख्य सिद्धांत है कि हंस शब्द आत्मा और ॐ का प्रतीक है, और श्वास में सदा गूँजने वाला सोऽहम् ध्यान का आधार है। इस ध्यान से द्वैत मिटता है और योगी ब्रह्म में लीन हो जाता है। प्रसिद्ध भाव है — श्वास का हंस ही अजपा मंत्र है। (भावानुवाद)
प्रसिद्ध कथन
श्वास में सदा गूँजने वाला सोऽहम् ही अजपा मंत्र है। (भावानुवाद)
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स्रोत: शुक्ल यजुर्वेद