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गौड़पाद कारिका

ग्रंथ

अन्य नाम: मांडूक्य कारिका, आगमशास्त्र, गौड़पादीय कारिका

रचयिता / कर्ता: गौड़पाद

अद्वैत वेदांतमांडूक्य उपनिषदकारिका

यह मांडूक्य उपनिषद पर गौड़पाद द्वारा रचित कारिका (पद्य-भाष्य) है, जिसे गौड़पाद कारिका, मांडूक्य कारिका तथा आगमशास्त्र कहा जाता है।

गौड़पाद अद्वैत वेदांत के प्राचीनतम प्रतिपादक आचार्यों में से हैं और शंकराचार्य की परंपरा में उन्हें परमगुरु कहा जाता है।

कारिका चार प्रकरणों में विभक्त है और इसमें अजातिवाद (अजन्मवाद), जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति की एकरूपता तथा अद्वैत का तर्कपूर्ण प्रतिपादन है। यह अद्वैत वेदांत का प्राचीनतम व्यवस्थित ग्रंथ माना जाता है और शंकर के दर्शन का आधार बना।

प्रसिद्ध कथन

न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता॥ (मांडूक्य कारिका २.३२)
अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते। अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा॥ (मांडूक्य कारिका १.१६)

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स्रोत: मांडूक्य कारिका