गांधारी का शाप
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: गांधारी का श्राप, गांधारी शाप
महाभारत युद्ध में गांधारी के सौ पुत्रों का अंत हो गया। पुत्र-शोक से व्याकुल गांधारी ने पांडवों और उनके सहयोगियों को शाप देने का मन बनाया, पर व्यास आदि ऋषियों ने उन्हें शांत किया।
गांधारी ने व्यास के वरदान से दिव्य दृष्टि पाकर युद्ध में मारे गए अपने पुत्रों को देखा। पुत्रों की दशा देखकर वे शोक और क्रोध से भर उठीं।
गांधारी ने श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहा कि जब कौरवों और पांडवों का नाश होते हुए तुमने देखा, तब तुम चुप रहे। इसलिए तुम्हारा यदुवंश भी आपस में लड़कर नष्ट होगा।
श्रीकृष्ण ने यह शाप शांत भाव से स्वीकार किया और कहा कि यह होना ही था। छत्तीस वर्ष बाद मौसल-संहार में यह शाप सत्य हुआ — यदुवंश आपस में लड़कर नष्ट हुआ और श्रीकृष्ण ने देह त्याग किया।
प्रसिद्ध कथन
गांधारी का शाप — 'जैसे तुमने कौरवों-पांडवों का संहार देखा और चुप रहे, वैसे ही छत्तीस वर्ष बाद तुम्हारा कुल भी आपसी संहार से नष्ट होगा।' (भावानुवाद)
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स्रोत: महाभारत – स्त्री पर्व