अघासुर वध
कथाएँ एवं घटनाएँ
यह वृंदावन की उन बाल-लीलाओं में से है जिनमें श्रीकृष्ण ने कंस द्वारा भेजे गए असुरों का संहार किया। अघासुर पूतना का भाई था और बहन की मृत्यु का बदला लेने के लिए वृंदावन आया। उसने एक अत्यंत विशाल अजगर का रूप धारण किया और ग्वाल-बालों के खेल-स्थल के मार्ग में मुँह खोलकर पड़ा रहा।
यह प्रसंग श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध में वर्णित है। उसका खुला मुँह गुफा या सुरंग जैसा दिखा, और भोले ग्वाल-बाल उसे देखकर भी भीतर चले गए। बलराम ने संदेह जताया, किंतु श्रीकृष्ण ने उन्हें सांत्वना देते हुए स्वयं भी उसके भीतर प्रवेश किया।
अंदर पहुँचकर श्रीकृष्ण ने अघासुर के कंठ में अपना शरीर बढ़ाकर उसका श्वास रोक दिया। अंततः अघासुर फूलकर फट गया और उसका प्राण निकल गया। इस प्रकार बालकों की रक्षा करके श्रीकृष्ण बाहर आए और देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। कथा का महत्व यह है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं और अहंकारी असुर चाहे कितना भी विशाल हो, उनके आगे टिक नहीं सकता।
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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – दशम स्कन्ध