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अक्षि उपनिषद

ग्रंथ

अन्य नाम: अक्ष्युपनिषद्, अक्षि उपनिषत्

रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय / परंपरा-प्रसिद्ध

उपनिषदवेदांतयजुर्वेद

अक्षि उपनिषद सूर्यदेव के मुख से दिए गए ब्रह्मज्ञान का उपदेश है। अक्षि का अर्थ है — नेत्र, और इसमें चाक्षुष्मती विद्या बताई गई है।

यह उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद से जुड़ा है और इसे सामान्य उपनिषदों में गिना जाता है। इसमें संकृति ऋषि सूर्य से ब्रह्मविद्या पूछते हैं।

इसका मुख्य सिद्धांत है कि ब्रह्म अद्वितीय, अनंत और शांत है और आत्मा उसी से अभिन्न है; ॐ के ध्यान से जीवन्मुक्ति मिलती है। प्रसिद्ध भाव है — अहं वासुदेवः, अर्थात् मैं वासुदेव (ब्रह्म) हूँ। (भावानुवाद)

प्रसिद्ध कथन

अहं वासुदेवः — ब्रह्म और आत्मा एक हैं, यही परम ज्ञान है। (भावानुवाद)

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सूर्यब्रह्मआत्माॐउपनिषद

स्रोत: कृष्ण यजुर्वेद