विश्ववारा
स्त्री-रत्न एवं विदुषियाँ
अन्य नाम: विश्ववारा, विश्ववारा आत्रेयी
विश्ववारा वैदिक काल की ऋषिका और ब्रह्मवादिनी थीं।
वे महर्षि अत्रि के कुल (आत्रेय परंपरा) से थीं और उन्होंने अपने पिता से वेदों का अध्ययन किया।
ऋग्वेद के पाँचवें मंडल के 28वें सूक्त की द्रष्टा विश्ववारा हैं, जो अग्नि-देवता को समर्पित है; इसमें प्रातःकाल अग्नि की स्तुति तथा गृहस्थ-जीवन की सुख-समृद्धि की प्रार्थना है। बृहद्देवता आदि ग्रंथों में उन्हें ब्रह्मवादिनियों की सूची में गिना गया है; स्त्री-शिक्षा और वैदिक ज्ञान में उनका महत्वपूर्ण स्थान है।
नाते-रिश्ते
- कुल: आत्रेय (अत्रि वंश)
- मार्गदर्शक: पिता (अत्रि कुल के ऋषि)
प्रसिद्ध कथन
प्रज्वलित अग्नि द्युलोक में प्रकाशित हो रही है; विश्ववारा पूर्व दिशा की ओर बढ़कर नमस्कार सहित देवताओं की स्तुति करती है। (ऋग्वेद 5.28 – भावानुवाद)
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स्रोत: ऋग्वेद