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विश्वामित्र-वसिष्ठ कथा

कथाएँ एवं घटनाएँ

विश्वामित्र आरम्भ में क्षत्रिय राजा थे, जो अपनी सेना और ऐश्वर्य पर गर्व करते थे। एक बार वे वसिष्ठ ऋषि के आश्रम में पधारे, जहाँ वसिष्ठ की कामधेनु (नंदिनी/सबला) ने उनकी और उनकी सेना की यथेष्ट सेवा की।

यह कथा महाभारत, रामायण तथा पुराणों में वर्णित है। विश्वामित्र ने उस दिव्य गाय को मोल या बल से लेने की इच्छा की, किंतु वसिष्ठ ने उसे देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह उनके आश्रम की आधार-शक्ति थी।

मुख्य पात्र विश्वामित्र और वसिष्ठ हैं। विश्वामित्र ने बलपूर्वक गाय को पकड़ना चाहा, तब नंदिनी ने वसिष्ठ के आदेश से अनेक योद्धा उत्पन्न करके उनकी सारी सेना को नष्ट कर दिया। अपमानित होकर विश्वामित्र ने समझा कि ब्रह्म-बल क्षत्रिय-बल से श्रेष्ठ है, और उन्होंने तपस्या से ब्रह्मर्षि बनने का संकल्प किया; कठोर तप के बाद वे 'ब्रह्मर्षि' विश्वामित्र कहलाए। कथा का महत्व यह है कि आत्म-संयम और तप की शक्ति सांसारिक बल से ऊँची है।

प्रसिद्ध कथन

धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्॥ (भावानुवाद) धिक्कार है क्षत्रिय-बल को; ब्रह्म-तेज ही सच्चा बल है।

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स्रोत: महाभारत – आदि पर्व तथा वाल्मीकि रामायण – बाल काण्ड