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वत्सनाभ

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: वत्सनाभ ऋषि, कृतघ्नता-निवारण, शंखतीर्थ

स्कन्द पुराणतपस्याकृतज्ञताशंखतीर्थ

वत्सनाभ नामक महर्षि ने अत्यंत कठोर तपस्या की। वे एक ही स्थान पर निश्चल खड़े रहे, यहाँ तक कि उनके शरीर पर दीमक की बाँबी बन गई, पर वे तप से विचलित न हुए। इंद्र ने उनकी परीक्षा हेतु सात दिन तक भयानक वर्षा की और वज्र गिराया। उनकी रक्षा के लिए धर्म ने स्वयं विशाल भैंसे का रूप धारण कर उनके ऊपर खड़े होकर वर्षा सही।

यह कथा स्कन्द पुराण के सेतु माहात्म्य (ब्रह्म खण्ड) में शंखतीर्थ की महिमा के प्रसंग में वर्णित है, और महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इसका संकेत मिलता है।

मुख्य पात्र वत्सनाभ, धर्म और इंद्र हैं। वर्षा रुकने पर वत्सनाभ ने सोचा कि उन्होंने अपने रक्षक भैंसे का सम्मान नहीं किया, माता-पिता की सेवा और गुरु-दक्षिणा नहीं दी, अतः वे कृतघ्न हैं। कृतघ्नता का प्रायश्चित देह-त्याग बताकर वे मेरु से कूदने चले, तब धर्म ने उन्हें रोका और शंखतीर्थ में स्नान करने का उपाय बताया। इस कथा का महत्व यह है कि कृतज्ञता सबसे बड़ा धर्म है और कृतघ्नता से बड़ा कोई दोष नहीं।

प्रसिद्ध कथन

धर्म ने कहा — 'मा त्वरिष्ठा' अर्थात् 'वत्स, जल्दबाजी मत करो।' (स्कन्द पुराण)

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धर्मइंद्रतपस्या

स्रोत: स्कन्द पुराण – सेतु माहात्म्य (ब्रह्म खण्ड)