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वरुण

वेद एवं पुराण

अन्य नाम: जलेश, अपांपति, प्रचेतस, पाशी, आदित्य

देवतालोकपालजलवैदिक

वरुण जल, समुद्र और वर्षा के देवता हैं — पर वैदिक काल में उनका स्थान इससे कहीं ऊँचा था। ऋग्वेद में वे 'ऋत' (ब्रह्मांडीय नियम व सत्य) के रक्षक और देवताओं के न्यायाधीश माने गए हैं, जो पापियों को पाश से बाँधते हैं। मित्र के साथ उनका युग्म 'मित्रावरुण' ऋग्वेद में अत्यंत पूज्य है।

उनका निवास वरुणलोक (जल के भीतर) है, वाहन मकर (मगर) और आयुध पाश (फंदा)। वे दिक्पालों में पश्चिम दिशा के रक्षक हैं और आदित्यों (अदिति के पुत्रों) में एक माने जाते हैं। कहीं-कहीं उनकी पत्नी वरुणानी (या गौरी) बताई गई है।

वैदिक साहित्य में वरुण का प्रभाव बाद के पुराणों में घटकर मुख्यतः जल-देवता तक सीमित हो गया — समुद्र, नदियों, वर्षा और जलचरों के स्वामी के रूप में। रामायण में समुद्र (वरुण का क्षेत्र) से राम को मार्ग देने की प्रार्थना और वरुण का शस्त्र-त्याग का प्रसंग आता है।

वरुण की स्तुति ऋग्वेद के अनेक सूक्तों (विशेषतः मंडल 1, 2, 7, 8) में मिलती है; विष्णु पुराण और महाभारत में भी उनकी भूमिका है।

नाते-रिश्ते

  • पिता: कश्यप
  • माता: अदिति
  • वाहन: मकर

प्रसिद्ध कथन

ऋग्वेद में वरुण से ऋत (सत्य व नियम) की रक्षा तथा पाप की क्षमा की प्रार्थना की गई है — वे पापियों को पाश से बाँधते और सत्यवानों की रक्षा करते हैं। (भावानुवाद)
मंत्र — "ॐ वरुणाय नमः।"
ऋग्वेद के वरुण-सूक्तों में उन्हें सूर्य को आकाश में पथ दिखाने वाला और समस्त जलों का स्वामी कहा गया है। (भावानुवाद)

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इंद्रअग्निवायुयमसूर्य

स्रोत: ऋग्वेद; विष्णु पुराण