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उपमन्यु

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: शिव भक्त उपमन्यु, व्याघ्रपाद पुत्र, उपमन्यु की तपस्या

शिव पुराणशिव भक्तितपस्यापंचाक्षर

उपमन्यु ऋषि व्याघ्रपाद के पुत्र तथा धौम्य ऋषि के अग्रज थे। बाल्यावस्था में उन्हें एक बार बहुत थोड़ा दूध मिला और वे बार-बार दूध माँगने लगे। निर्धन माता ने उन्छवृत्ति से जुटाए अन्न को पीसकर कृत्रिम दूध बनाकर दिया, जिसे उपमन्यु ने 'यह दूध नहीं है' कहकर अस्वीकार कर दिया। तब माता ने कहा कि शिव की कृपा के बिना दूध नहीं मिलता।

यह कथा शिव पुराण की शतरुद्र संहिता में विस्तार से वर्णित है, जहाँ इसे शिव के सुरेश्वरावतार का प्रसंग कहा गया है; महाभारत के अनुशासन पर्व में भी उपमन्यु की शिव-भक्ति का वर्णन मिलता है।

मुख्य पात्र उपमन्यु, उनकी माता, व्याघ्रपाद, शिव और पार्वती हैं। उपमन्यु हिमालय पर जाकर वायु-आहार करते हुए, आठ ईंटों का मंदिर बनाकर मिट्टी के शिवलिंग की पूजा और पंचाक्षर मंत्र का जप करने लगे। शिव ने इंद्र का वेष धारण कर उनकी परीक्षा ली, पर उपमन्यु ने शिव के अतिरिक्त किसी अन्य देव से वर माँगने से इनकार कर दिया। प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें दूध, दही और मधु के सहस्रों सागर, अमरत्व, सनातन कुमारत्व तथा पाशुपत ज्ञान प्रदान किया। इस कथा का महत्व यह है कि अनन्य भक्ति और दृढ़ निष्ठा से भगवान प्रसन्न होते हैं।

प्रसिद्ध कथन

उपमन्यु ने कहा — 'मैं तुमसे, विष्णु से या ब्रह्मा से कोई वर नहीं चाहता; मेरे लिए केवल शंकर ही वरदाता हों।' (भावानुवाद)

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स्रोत: शिव पुराण – शतरुद्र संहिता; महाभारत – अनुशासन पर्व