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तर्पण

संस्कार एवं श्राद्ध-विधि

अन्य नाम: तर्पण, तर्पणम्, जल-अर्पण

श्राद्धपितृगरुड़ पुराणअमावस्या

तर्पण का अर्थ है तृप्त करना। इसमें जल, काले तिल और कुश के माध्यम से पितरों को जल की अंजलि अर्पित की जाती है।

यह स्नान के बाद, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके और जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखकर किया जाता है। पहले पितरों का आवाहन होता है, फिर पिता, पितामह और प्रपितामह को नाम सहित तिल-जल अर्पित किया जाता है।

इसका आधार शुक्ल यजुर्वेद, गरुड़ पुराण और गोभिल गृह्यसूत्र हैं। इसका महत्व पितरों की क्षुधा और तृषा शांत करने तथा उनकी तृप्ति में माना जाता है।

प्रसिद्ध कथन

ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्त्वपोऽञ्जलिम्॥ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् तृप्यतु॥

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स्रोत: गरुड़ पुराण