पिंडदान
संस्कार एवं श्राद्ध-विधि
अन्य नाम: पिंडदान, पिण्डदान, पिंड-अर्पण
पिंडदान में पितरों को चावल, तिल, जौ या सत्तू के पिंड अर्थात् गोले अर्पित किए जाते हैं। यह श्राद्ध का मुख्य अंग है।
यह श्राद्ध, तर्पण और अंत्येष्टि के बाद के कर्मों में किया जाता है। पिंड बनाकर कुश पर रखे जाते हैं और गोत्र तथा नाम के साथ पितरों को अर्पित किए जाते हैं; पार्वण श्राद्ध में तीन पिंड बनते हैं।
इसका उल्लेख गरुड़ पुराण, मत्स्य पुराण और गृह्यसूत्रों में मिलता है। गया में पिंडदान का विशेष महत्व है। इसका महत्व पितरों की तृप्ति और उन्हें मोक्ष की ओर बढ़ाने में माना जाता है।
प्रसिद्ध कथन
ॐ ये चेह पितरो ये च नेह यांश्च विद्म यांश्च न प्रविद्म। त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः ताभ्यः स्वधा अनु ये तृप्यन्तु॥
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स्रोत: गरुड़ पुराण