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शांतनु

महाभारत

अन्य नाम: प्रतीपपुत्र, कुरुराज, शांतनु

कुरुवंशहस्तिनापुरगंगासत्यवतीराजा

शांतनु हस्तिनापुर के राजा प्रतीप के पुत्र थे और कुरुवंश के प्रतापी शासक थे। एक दिन उन्होंने गंगा नदी के तट पर अत्यंत रूपवती देवी गंगा को देखा और उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने शर्त रखी कि वे उनके किसी भी कार्य में विरोध नहीं करेंगे, और शांतनु ने स्वीकार कर लिया।

गंगा से उनके अनेक पुत्र हुए, परंतु गंगा ने सात पुत्रों को जन्म लेते ही जल में प्रवाहित कर दिया, क्योंकि वे वसुओं के शाप से मुक्त होने को जन्मे थे। आठवें पुत्र को बचाने के लिए शांतनु ने विरोध किया और गंगा उसे ‘देवव्रत’ (बाद में भीष्म) के रूप में सौंपकर चली गईं।

वृद्धावस्था में शांतनु सत्यवती के प्रेम में पड़े; भीष्म की प्रतिज्ञा के कारण उनका विवाह संभव हुआ। सत्यवती से उन्हें चित्रांगद और विचित्रवीर्य पुत्र हुए। शांतनु प्रेम, वात्सल्य और राजकीय कर्तव्य के बीच संघर्ष का पात्र है; उनका जीवन कुरुवंश की समस्त आगामी कथा का आधार बना।

नाते-रिश्ते

  • पत्नी: गंगा, सत्यवती
  • पुत्र: भीष्म, चित्रांगद, विचित्रवीर्य
  • वंश: कुरु/चंद्रवंश

पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध

पूर्वजन्म में राजा महाभिष थे; गंगा पर आसक्त होने के ब्रह्मा के शाप से शांतनु रूप में जन्मे।

प्रसिद्ध कथन

गंगा की शर्त स्वीकार करते हुए (भावानुवाद) — “जो भी तुम करोगी, मैं उसमें विरोध नहीं करूँगा।”
गंगा के गमन पर शोक (भावानुवाद) — “जिस पुत्र को मैंने बचाया, उसी को लेकर तुम मुझसे दूर चली गईं।”

संबंधित

गंगासत्यवतीभीष्मपांडुहस्तिनापुर

स्रोत: महाभारत – आदि पर्व