अश्वत्थामा
महाभारत
अन्य नाम: द्रोणपुत्र, द्रोणायनि, चिरंजीवी
अश्वत्थामा द्रोणाचार्य और कृपी के पुत्र थे। जन्म के समय उन्होंने अश्व की भाँति हिनहिनाया था, इसीलिए उनका नाम अश्वत्थामा रखा गया। शिव की कृपा से उन्हें अमरत्व और शरीर पर अभेद्य कवच प्राप्त था, इसीलिए वे ‘चिरंजीवी’ माने जाते हैं। वे द्रोण के प्रिय पुत्र तथा कुरुक्षेत्र के महारथी थे।
युद्ध में उन्होंने अनेक बार पांडव-सेना को संकट में डाला और नारायणी अस्त्र का प्रयोग किया। पिता द्रोण की मृत्यु के बाद प्रतिशोध से भरकर उन्होंने रात्रि में सोते हुए धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी, जो युद्ध-धर्म के घोर विरुद्ध था।
अंत में उन्होंने परीक्षित की माता उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया; कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से उस गर्भ को बचाया, जिससे परीक्षित का जन्म संभव हुआ। इस घोर पाप के कारण कृष्ण ने उन्हें शाप दिया कि वे तीन हज़ार वर्षों तक रोगग्रस्त और निर्जन अवस्था में भटकते रहेंगे। अश्वत्थामा प्रतिशोध, पितृ-स्नेह और अंध-क्रोध के विनाशकारी परिणाम का प्रतीक है।
नाते-रिश्ते
- पिता: द्रोणाचार्य, माता: कृपी
- मामा: कृपाचार्य
- शिष्य: दुर्योधन आदि
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
पूर्वजन्म में महादेव, यम, काम व क्रोध के संयुक्त अंश से जन्मे; रुद्र का अंश माने जाते हैं।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: महाभारत – द्रोण पर्व; सौप्तिक पर्व