जैसी संगति वैसा चरित्र
कथाएँ एवं घटनाएँ
यह कथा संगति के प्रभाव को दर्शाती है। कहा जाता है कि एक ही वृक्ष से लाए गए दो तोते के बच्चों में से एक संत के आश्रम में और दूसरा वधिक के घर में पला।
यह कथा परंपरा-प्रसिद्ध है और इसे तुलसीदासकृत रामचरितमानस की इस उक्ति से जोड़ा जाता है—'साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं।' अर्थात् साधु के घर के तोते-मैना राम-नाम जपते हैं, और असाधु के घर के गाली देते हैं।
संत के आश्रम में पला तोता 'राम-राम' बोलता था, जबकि वधिक के घर पला तोता हिंसा और कठोर शब्द ही सीख गया। मुख्य पात्र ये दो पक्षी ही हैं, जो एक ही जाति के होकर भी अपनी संगति के अनुसार भिन्न बन गए। कथा का महत्व यह है कि मनुष्य का चरित्र उसकी संगति से बनता है; इसलिए सत्संग का आश्रय लेना चाहिए।
प्रसिद्ध कथन
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥ (रामचरितमानस)
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स्रोत: परंपरा-प्रसिद्ध