गर्भाधान संस्कार
संस्कार एवं श्राद्ध-विधि
अन्य नाम: गर्भाधान, गर्भाधानम्
गर्भाधान सोलह संस्कारों में प्रथम संस्कार है। इसका अर्थ है गर्भ का आधान अर्थात् संतान की स्थापना। यह विवाह के बाद दांपत्य जीवन को संतानोत्पत्ति के पवित्र उद्देश्य से जोड़ता है।
यह विवाह के चौथे दिन अथवा ऋतुकाल में, पत्नी के शुद्ध स्नान और मंगलाचार के बाद किया जाता है। पति-पत्नी मंत्रोच्चार के साथ संकल्प लेते हैं और गर्भ में शुभ संस्कारों की स्थापना की प्रार्थना करते हैं।
इसकी विधि शौनक, आश्वलायन, पारस्कर और गोभिल आदि गृह्यसूत्रों तथा मनुस्मृति में वर्णित है। इसका महत्व यह है कि यह संतान को शुद्ध बीज और दिव्य संस्कार प्रदान करने तथा गृहस्थ-धर्म का आधार बनने में माना जाता है।
प्रसिद्ध कथन
ॐ विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु। आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते॥
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स्रोत: गृह्यसूत्र