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दधीचि का अस्थि-दान

कथाएँ एवं घटनाएँ

अथर्ववेद के प्रकांड विद्वान् महर्षि दधीचि ब्रह्मचर्य और त्याग की मूर्ति थे। जब त्वष्टा के पुत्र वृत्रासुर ने देवताओं को पराजित कर दिया, तो देवता भयभीत होकर उपाय खोजने लगे।

यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण तथा महाभारत से जुड़े आख्यानों में वर्णित है। देवताओं ने भगवान विष्णु के परामर्श से निर्णय लिया कि वृत्रासुर का वध केवल एक ऐसे अस्त्र से संभव है जो महान् तपस्वी की अस्थियों से बने।

मुख्य पात्र महर्षि दधीचि, इंद्र और देवता हैं। दधीचि ने लोक-कल्याण के लिए अपना शरीर त्यागने का वरदान पहले ही दे रखा था; अतः उन्होंने प्रसन्नता से प्राण त्याग दिए और देवताओं ने उनकी अस्थियों से दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा वज्र का निर्माण कराया। उसी वज्र से इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया। कथा का महत्व यह है कि दधीचि का अस्थि-दान आत्म-बलिदान और लोक-हित की पराकाष्ठा है, जिसे सदा स्मरण किया जाता है।

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण तथा महाभारत; परंपरा-प्रसिद्ध