ब्रह्म उपनिषद
ग्रंथ
अन्य नाम: ब्रह्मोपनिषद्
रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय / परंपरा-प्रसिद्ध
ब्रह्म उपनिषद आत्मा की चार अवस्थाओं और संन्यास का प्रतिपादन करने वाला उपनिषद है। यह पिप्पलाद ऋषि और शौनक महाशाल के संवाद के रूप में है।
यह उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद से जुड़ा है और इसे संन्यास उपनिषदों में गिना जाता है। इसमें जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय — इन चार अवस्थाओं का वर्णन है।
इसका मुख्य सिद्धांत है कि यह शरीर ब्रह्म का नगर है और निर्गुण ब्रह्म का ध्यान ही मुक्ति का मार्ग है; बाहरी कर्मकांड नहीं, ज्ञान ही सर्वोपरि है। प्रसिद्ध भाव है — यह शरीर ब्रह्मपुरम् (ब्रह्म का नगर) है। (भावानुवाद)
प्रसिद्ध कथन
अयं शरीरो ब्रह्मपुरम् — यह शरीर ब्रह्म का नगर है। (भावानुवाद)
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स्रोत: कृष्ण यजुर्वेद