विराध
रामायण एवं रामचरितमानस
अन्य नाम: विराद
विराध दंडक वन का भयानक राक्षस था। कथा के अनुसार वह पूर्व जन्म में गंधर्व तुंबुरु था, जिसे कुबेर के शाप से राक्षस-योनि मिली थी; वह जय नामक राक्षस के पुत्र रूप में जन्मा।
वन में उसने सीता का अपहरण कर लिया और राम-लक्ष्मण को कंधों पर उठाकर भागने लगा। राम और लक्ष्मण ने उसकी दोनों भुजाएँ काट दीं, पर वह मरणासन्न नहीं हुआ।
वरदान के कारण शस्त्रों से उसका वध संभव नहीं था, अतः राम के कहने पर लक्ष्मण ने गड्ढा खोदकर उसे जीवित दफना दिया। मरते समय विराध ने अपना वास्तविक परिचय दिया और राम को शरभंग ऋषि के आश्रम जाने का परामर्श दिया; इस प्रकार वह शाप से मुक्त होकर स्वर्ग सिधारा।
नाते-रिश्ते
- पूर्व रूप: गंधर्व तुंबुरु
- पिता: जय (राक्षस)
- मुक्तिदाता: राम
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
पूर्व जन्म में गंधर्व तुंबुरु थे; कुबेर के शाप से राक्षस-योनि मिली।
प्रसिद्ध कथन
विराध ने राम से कहा — "मैं वस्तुतः गंधर्व तुंबुरु हूँ; कुबेर के शाप से यह राक्षस-रूप मिला था। तुम्हारे हाथों मारा जाकर मैं शाप से मुक्त हो गया।" (भावानुवाद)
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स्रोत: वाल्मीकि रामायण – अरण्यकाण्ड