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त्र्यरुण

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: त्रय्यारुण, त्र्यरुण राजा, वृषजान

इक्ष्वाकु वंशअयोध्यापुरोहितअग्नि

त्र्यरुण इक्ष्वाकु वंश के अयोध्या के राजा थे। एक बार उन्हें सारथी की आवश्यकता हुई, तब उनके पुरोहित वृषजान ने घोड़ों की लगाम थाम ली। मार्ग में एक बालक आ गया और अथक प्रयास के बाद भी घोड़े रुके नहीं, जिससे वह रथ के पहिये से कुचलकर मर गया। पुरोहित ने अथर्वन मंत्रों से उसे पुनर्जीवित कर दिया, पर अपराधी कौन है—सारथी या रथी—इस पर विवाद उठ खड़ा हुआ।

यह प्रसंग वैदिक आख्यान परंपरा में आता है और पुरोहित-राजा संबंधों के आरंभिक वर्णनों से जुड़ा है। इसका उल्लेख प्राचीन ऋषि-कथाओं में मिलता है।

मुख्य पात्र राजा त्र्यरुण, पुरोहित वृषजान और इक्ष्वाकु हैं। इक्ष्वाकु के निर्णय से वृषजान को देश छोड़ना पड़ा, जिससे अग्नि का ताप लुप्त हो गया और प्रजा को कष्ट हुआ। राजा ने पुरोहित से क्षमा माँगी; तब पुरोहित ने बताया कि रानी पिशाचिनी है, और अग्निदेव ने उसे भस्म कर दिया, जिससे अग्नि का तेज लौट आया। इस कथा का महत्व यह है कि न्याय में पक्षपात विनाशकारी होता है और ब्राह्मण-पुरोहित का सम्मान आवश्यक है।

प्रसिद्ध कथन

राजा ने कहा — 'पुरोहितवर, आपका धर्म क्षमादान है; मेरा दंडदान कीजिए और आप मुझे क्षमा कीजिए।' (भावानुवाद)

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इक्ष्वाकुअग्नि

स्रोत: परंपरा-प्रसिद्ध (वैदिक आख्यान)