सहस्रकिरण
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: सहस्रकिरण राजा, शतवाहु पुत्र, जलक्रीड़ा प्रसंग
सहस्रकिरण राजा शतवाहु के पुत्र थे। एक बार वे अपनी रानियों के साथ नदी में जलक्रीड़ा कर रहे थे और उन्होंने जलयंत्र लगाकर पानी रोक रखा था। उसी नदी-तट पर रावण देव-प्रतिमाओं की पूजा कर रहा था। क्रीड़ा समाप्त होने पर जब सहस्रकिरण ने रोका हुआ जल छोड़ा, तो उसका वेग रावण की पूजा में बाधक बना।
यह प्रसंग जैन परंपरा के पउमचरित (जैन रामायण) में वर्णित है, जहाँ रावण को जैन-परंपरा के अनुसार चित्रित किया गया है।
मुख्य पात्र सहस्रकिरण, उनके पिता शतवाहु और रावण हैं। क्रुद्ध रावण ने सहस्रकिरण से युद्ध कर उसे पाशबद्ध कर लिया। तब उसके पिता शतवाहु वहाँ आए और उन्होंने राज्य पुत्र को सौंपकर स्वयं दीक्षा ले ली; उनके अनुरोध पर रावण ने सहस्रकिरण को मुक्त कर दिया, और वह भी राज्य सौंपकर दीक्षा लेकर पिता के साथ चला गया। इस कथा का महत्व यह है कि संसार की क्षणभंगुरता और वैराग्य का भाव प्रकट होता है।
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स्रोत: परंपरा-प्रसिद्ध (पउमचरित; जैन रामायण)