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नृग

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: राजा नृग, नृग की कथा, गिरगिट योनि, नृग तीर्थ

भागवतदानब्राह्मण धनगिरगिट

नृग इक्ष्वाकु के पुत्र तथा अत्यंत दानी राजा थे। उन्होंने अनगिनत गौएँ, स्वर्ण, भूमि और अन्न दान किया। पर एक बार एक ब्राह्मण की गाय उनके गो-धन में मिल गई, और यह न जानते हुए उन्होंने वह गाय दूसरे ब्राह्मण को दान कर दी। दोनों ब्राह्मण आपस में झगड़ते हुए उनके पास आए, पर कोई भी क्षतिपूर्ति स्वीकार नहीं की।

यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध में विस्तार से वर्णित है; विष्णु पुराण तथा स्कन्द पुराण (नृग तीर्थ) में भी इसका उल्लेख मिलता है।

मुख्य पात्र नृग, दो ब्राह्मण, यमराज और श्रीकृष्ण हैं। देह त्याग के बाद यमराज ने पूछा कि पहले पुण्य का फल भोगोगे या पाप का; नृग ने पाप पहले चुना और गिरगिट की योनि में जन्मा। द्वारका के निकट एक सूखे कुएँ में पड़े उस गिरगिट को श्रीकृष्ण ने अपने हाथ के स्पर्श से मुक्त किया। इस कथा का महत्व यह है कि अज्ञानवश भी ब्राह्मण का धन या वस्तु हरण करना महापाप है; श्रीकृष्ण की कृपा से ही उद्धार होता है।

प्रसिद्ध कथन

श्रीकृष्ण ने कहा — 'हलाहल विष की चिकित्सा हो सकती है, पर ब्राह्मण का धन परम विष है, जिसका कोई उपाय नहीं।' (भावानुवाद)

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – दशम स्कन्ध