कठ शाखा
ग्रंथ
अन्य नाम: काठक शाखा, कठक शाखा
रचयिता / कर्ता: कठ (कठक परम्परा) / परंपरा-प्रसिद्ध
कठ शाखा (काठक) कृष्ण यजुर्वेद की शाखा है; इसकी संहिता काठक संहिता कहलाती है।
यह मुख्यतः कश्मीर तथा पंजाब-हिमाचल के क्षेत्रों में प्रचलित रही; इसकी मौखिक परम्परा अब प्रायः लुप्त मानी जाती है।
कठोपनिषद तथा काठक ब्राह्मण इससे जुड़े हैं; कपिष्ठल शाखा इसकी निकट सम्बन्धी शाखा मानी जाती है।
प्रसिद्ध कथन
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥ (कठोपनिषद १.३.१४)
संबंधित
स्रोत: vedicheritage.gov.in (Yajurveda); TITUS (Survey of Vedic texts)